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आओ बसंत

आओ बसंत, छाओ बसंत

पुलकित हो मन, आनंद मगन

 

फूलों के रंग, परागों के संग

सरोवरों में बन कर कमल

 

ले कर सुगन्ध, आंगन भवन

बहकी चले, शीतल पवन

 

हर ओर करें भंवरे गुंजन

बागों में हो कोयल के स्वर

 

फूटे कपोल, सुन्दर चमन

सरसों के खेत, मंगल शगुन

 

तोतों के झुंड, दिखते गगन

बौरों में छिप बैठे अनंग

 

धरती सजे बनकर दुल्हन

उत्सव में हो हर एक कण

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“जय हिन्द”

“जय हिन्द”

उठो सम्मान करो उन सैनिक वीर जवानो का ,

जो दिनरात खड़े है सरहद पर हम सबकी जान बचाने को ,

सम्मान करे उन वीरो का जो शहीद हुए देश के लिए ,

अपना शीश झुका कर बलिदान दे गए तिरंगे के लिए |

७० वर्ष के गणतंत्र पर आओ हम सब कसम खाये,

न झुकने देंगे देश को दुनिया में नाम बढ़ाएंगे ,

गरीबी, भूख, बेरोजगारी से लड़ेंगे ,

ईमानदारी से मजबूत भारत बनाएँगे |

“जय हिन्द”

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पतझड़

मन की शाखाओं पर पड़े

अवसाद के पीले पत्ते

व्यंग बाणों से घायल

जड़ से हुए ढीले पत्ते

संताप के भावों से

जीर्ण हुए गीले पत्ते

गरल जगत का पीते पीते

हुए जो जहरीले पत्ते

समय रेत में ढलते ढलते

जमे हुए हठीले पत्ते

उड़ जाने दो इस बार उन्हें

हवाओं संग पतझड़ की

धरातल पर मन के बनने दो

उनको मिट्टी उर्वर की

मन का ठूंठ हो तैयार

उगे फिर नए लचीले पत्ते

जीवन के चमकीले पत्ते

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जैसे दिसम्बर की धूप

साथ तुम्हारा लगता अच्छा

बातें लगती खूब

जैसे दिसम्बर की धूप

 

फुर्सत के क्षण लाना

अपने साथ बैठाना

अनुभव को छूते छूते

मनोरथ की रूह सहलाना

सहनशीलता के अनुरूप

जैसे दिसम्बर की धूप

 

भ्रम के कोहरे को काटकर

संशय के बादल छांटकर

जगाना संकल्पों की भूख

जैसे दिसम्बर की धूप

 

अतीत के काफिले को थाम

दिखाना उगता हुआ धाम

पास प्यासे के ले आना

संभावनओं का कूप

जैसे दिसम्बर की धूप

 

राहत की ठंड़क मिली

जो थे जलते हुए ख्वाब

सर्द सोते स्वप्न को मिला

अरमानों का अलाव

हर दिशा लाई हवा

जीवन से भरपूर

जैसे दिसम्बर की धूप

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स्वागत! शीत!

स्वागत! शीत! आओ
बन के मीत भाओ
स्वागत! शीत! आओ

क्रोध ग्रीष्म का हो क्षीण
नभ अश्रु से हो हीन
राहत! गीत! गाओ
स्वागत! शीत! आओ

वामन स्वरूप आए दिन
कोहरे से रात जाए छिन
आलस! प्रीत! छाओ
स्वागत! शीत! आओ

भीतर तक ठंडक समाए
गर्माहट समीप बुलाए
अलाव! संगीत! सुनाओ
स्वागत! शीत! आओ

गुड़ की फैले मिठास
मूंगफली मेवों के साथ
आनंद! स्वादिष्ट! पकाओ
स्वागत! शीत! आओ

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कोरा कागज़

मिला मुझे एक कोरा कागज़

मैं उसपर अरमान लिखूंगी

कलम प्यार में डुबा डुबाकर

उस पर सारा संसार लिखूंगी

 

गीत लिखूंगी अनुभव का मैं

शब्दों का व्यवहार लिखूंगी

स्वप्न रचूंगी वैभव का मैं

उसपर अपना अधिकार लिखूंगी

मिला मुझे एक कोरा कागज़

मैं उसपर उत्थान लिखूंगी

 

जड़ लिखूंगी मिट्टी में मैं

ऊँची ऊपर उड़ानलिखूंगी

जहाँ हवा बहे अनुकूलतम

ऐसा आसमानलिखूंगी

मिला मुझे एक कोरा कागज़

मैं उसपर परवान लिखूंगी

 

आंगन में त्योहार लिखूंगी

चेहरों पर मुस्कान लिखूंगी

हर कोने में प्राण भरूंगी

और अपनी पहचान लिखूंगी

मिला मुझे एक कोरा कागज़

मैं उसपर सम्मान लिखूंगी