चलो बीज बोते हैं

चलो बीज बोते हैं
हरे भरे जीवन का सपना संजोते हैं
चलो बीज बोते हैं

संयम की धरती पर सब्र का बीज बोयेंगे
सदाचार के पानी से सींचेंगे
सुना है, ऐसे बहुत मीठे फल होते हैं
चलो बीज बोते हैं

संकल्प की धरती पर ज्ञान का बीज बोयेंगे
पसीने को पानी बना उसी से सींचेंगे
इसी तरह तो सफलता के फल ढोते हैं
चलो बीज बोते हैं

संवेदना की धरती पर दोस्ती का बीज बोयेंगे
आंख के पानी से इसे सींचेगे
ऐसे खुशी के फल वाले कभी नहीं रोते हैं
चलो बीज बोते हैं

जब मंडी में जाएं फल और हो इनका विश्लेषण
तो यह न मन में आए
कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पाए
संतुष्टि के फल वाले ही चैन से सोते हैं
चलो बीज बोते हैं

courtesy: http://www.sahityashilpi.com/2017/11/blog-post_14.html

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प्रभुजी

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

हम तुम्हारी कृपा के उबारे है।

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

 

भूलभुलईया दुनिया सारी, राह न सूझे कोई

कहीं पे कुआँ गहरा दिखता कहीं पे दिखती खाई

सुझा दो जो रस्ते हमारे हैं।

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

 

किसी को सोना किसी को चाँदी सुन लो चाहहमारी

आशीषों से अपने भर दो, मूल्यवान तिजोरी

हम तुम्हारी ही पूँजी संभाले हैं

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

 

सब के कर्ता सब के धर्ता हम कोआस तुम्हारी

अपने रूपों से सजा दो, अपनी प्रेम क्यारी

तुम हो तो सुन्दर नजारे हैं

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

 

तुमने गले लगाया उसे जिसको सबने ठुकराया

अनहोने न्यायों से तुमने अपना नाम जताया

मिटा दो जो संकट हमारे हैं

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

 

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

बिन तुम्हारे तो हम बेचारे हैं

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

तितलियाँ

जब उड़ेंगी, रंग भरेंगी तितलियाँ
हवाओं में आकर्षण रहेंगी तितलियाँ

ढूँढते हो कहाँ यहाँ वहाँ
संग फूलों के मिलेंगी तितलियाँ

लगने दो धूप पंखों को जरा
उड़ तभी तो सकेंगी तितलियाँ

मिले बाग उपवन तो बन जाए बात
कैसे कंकरीट में जिऐंगी तितलियाँ

रसोई फूल की जाएगी फ़िज़ूल
पराग अगर नहीं चखेंगी तितलियाँ

हवा के संग ही बहते हैं सभी फूल पत्तियाँ
फ़िज़ा से कब तक बचेंगी तितलियाँ

तेज़ाबी हवा में फूल भी उगलेंगे ज़हर
कौन जाने फिर कहाँ रहेंगी तितलियाँ

आए त्यौहार

http://hindi.webdunia.com/hindi-poems/hindi-poem-on-festival-117100300069_1.html

मन प्रसन्न

छाए, हर्ष उल्लास

आए त्यौहार

 

घर आंगन

खुशी, मंगलाचार

आए त्यौहार

 

पूरा ब्रह्मांड

सजा, कर श्रृंगार

आए त्यौहार

 

देवी देवता

करें, धरा विहार

आए त्यौहार

 

शीश नवाएं

ले जाए, वरदान

आए त्यौहार

 

चारों तरफ

बधाई व्यवहार

आए त्यौहार

चलो बुलावा आया है लिरिक्स

दोहा: माता जिनको याद करे, वो लोग निराले होते हैं।

माता जिनका नाम पुकारे, किस्मत वाले होतें हैं।

चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है।
ऊँचे पर्वत पर रानी माँ ने दरबार लगाया है।
सारे जग मे एक ठिकाना, सारे गम के मारो का,
रास्ता देख रही है माता, अपने आंख के तारों का।
मस्त हवाओं का एक झोखा यह संदेशा लाया है।
जय माता की कहते जाओ, आने जाने वालो को,
चलते जाओ तुम मत देखो अपने पाँव के छालों को।
जिस ने जितना दर्द सहा है, उतना चैन भी पाया है।
वैष्णो देवी के मन्दिर मे, लोग मुरादे पाते हैं,
रोते रोते आते है, हस्ते हस्ते जाते हैं।
मैं भी मांग के देखूं, जिस ने जो माँगा वो पाया है।
मैं तो भी एक माँ हूं माता,
माँ ही माँ को पहचाने।
बेटे का दुःख क्या होता है और कोई यह क्या जाने।
उस का खून मे देखूं कैसे, जिसको दूध पिलाया है।
प्रेम से बोलो, जय माता दी
ओ सारे बोलो, जय माता दी
वैष्णो रानी, जय माता दी
अम्बे कल्याणी, जय माता दी
माँ भोली भाली, जय माता दी
माँ शेरों वाली, जय माता दी
झोली भर देती, जय माता दी
संकट हर लेती, जय माता दी
ओ जय माता दी, जय माता दी ||

बात जो मुँह से निकली

http://hindi.webdunia.com/hindi-poems/hindi-poem-117091500053_1.html

सूखे पत्तों पर पड़ी चिंगारी, भभक जाएगी

बात जो मुँह से निकली, दूर तक जाएगी

 

चिड़िया पिंजरों से टकराकर पंख फड़फड़ाएगी

हवा धूल को दूर शिखर तक पहुँचाएगी

 

वो गहराई है जो समुद्र के मोती पाएगी

फेन तो लहरों पर कूदकर ही इठलाएगी

 

ध्यान दो, दिवारें भी किस्से बताएगी

या फिर बातें नदिया सी बह जाएगी

 

बीज गिर गए थे कुछ अनजाने में

बरसात में उनकी भी फसल लहलहाएगी

मन की गांठ

http://hindi.webdunia.com/hindi-poems/hindi-poem-117082500029_1.html

मन की गांठ

बोई नहीं जाती

ग्लैडुला की गांठ की तरह

जो अपनी बगिया महकाए

भाए आँखों को

 

मन की गांठ

बांधी नहींजाती

बंधनी की गांठ की तरह

जो अपना धरातल सजाए

ओढ़नी ओढ़ाए नातों को

 

मन की गांठ

लाई नहीं जाती

प्याज़ की गांठ की तरह

जो परत दर परत खुलती जाए

बढ़ाए रसोई के स्वादों को

 

मन की गांठ

लग जाती है

कर्कटी गांठ की तरह

दुखती चुभती फैलती जाए

टाल दो कर प्रेमयुक्त संवादों को

हिन्दी की गतिशीलता

भाषा के विषय मेँ एक कहावत है – भाषा बहता नीर, अर्थात भाषा कुछ न कुछ नया ग्रहण करती रहती है। औद्योगिक क्राँतियां और विकास समाज को नई दिशा देते हैं। विकास एवं बदलाव की वही दर भाषा को भी अपनानी पड़ती है जिससे कि वो जन समुदायों पर अपनी पकड़ बनाए रखे। विकास की गति से दौड़ती सभ्यता की रेस में भाषा कहीं पीछे न छूट जाए अतः भाषा को भी प्रवाहमय एवं गतिशील बनना पड़ता है।

आज का युग एक परम प्रगति का युग है। शहर तो शहर, गाँव भी मशीनीकरण की गिरफ़्त में हैं। मोबाइल, कम्प्यूटर, लैपटाप जैसे उपकरण अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रह गए और न ही ‘एस. एम. एस.’, ‘फेसबुक’, ‘वाट्सअप’ जैसी उपयोगिताएँ। ऐसे में भाषा अनछुई तो नहीं रह सकती। तेज परिवर्तन की आँधी में भाषा भी बहती है। समाज में हो रहे इस बदलाव का असर भाषा पर भी पड़ता है। भाषा की शब्द संपदा भी सोच और व्यवस्था के परिवर्तन के साथ गतिशील रहती है।

हमारी प्यारी, दिल से दिल तक पहुँचने वाली, भाषा, हिन्दी है। हिन्दी के विषय में कहीं पढ़ा है –

मैं राष्ट्र गगन के मस्तक पर

सदियों से अंकित बिंदी हूँ

मैं सबकी जानी पहचानी

भारत की भाषा हिन्दी हूँ।

हिन्दी कम से कम हजार साल से तो हमारे समाज की संपर्क भाषा रही है। यह हिन्दी की गतिशीलता ही है जो वह इतने लम्बे समय से इतने बड़े हिस्से की भाषा रही है। हिन्दी आम व्यक्ति की भाषा है और यही तथ्य इसे खास भी बनाता है। इन दिनों जो हिन्दी बोली जा रही है वह बहुत ही मजेदार और दिलचस्प है। कई सारे अशुद्ध, अधकचरे और अटपटे भाषिक प्रयोग हिन्दी के साथ हो रहे हैं और यह आश्वस्तिकारक है। हिन्दी बहता नीर है। जब नदी बहती है तो वह केवल साफ सुथरी नहीं रह सकती। साफ सुथरा पूल का पानी होता है। हिन्दी स्वीमिंग पूल में कैद पानी नहीं है। वह तो लोक के कंधे पर सवार हो कर चलती है। यह भाषा के व्यापक होने और जन संपर्क की भाषा होने का प्रमाण है। हिन्दी एक जिन्दा भाषा है और जिंदगी लचीली होती है।

आज हिन्दी में अन्य भाषाओं से शब्द तेजी से जुड़ रहे हैं। पहले हिन्दी के साथ उर्दू का मेल हुआ था, अब अंग्रेजी व प्रादेशिक भाषाओं का मेल हो रहा है। यहाँ यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि अठारहवीं सदी में जिस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी हमारे भारत पहुँची थी तब इंग्लैंड के अभिजात्यों की भाषा अंग्रेजी नहीं, फ्रेंच थी। उस समय वहां के नवांकुरों ने महसूस किया कि दुनिया भर में अपना सिक्का चलाने के साथ साथ उन्हें अपनी भाषा भी चलानी होगी। अतः अंग्रेजी को शब्द संपदा के लिए लचीला कर दिया गया। उस समय अंग्रेजी के लचीलेपन का उदाहरण हम आज तक देख रहें हैं।

भाषा जहाँ बोली जाती है, जहाँ भाषा बनती है अर्थात सड़कों-चौराहों पर वहाँ भाषा के अद्भुत रूप देखने को मिलते हैं। वह अनौपचारिक भाषा होती है, किन्तु वही भाषा की समृद्धता है और वहीं से भाषा की शब्द संपदा नियंत्रित होती है। अगर हम सुनें कि सड़क पर लोग क्या बोलते हैं, पान वाले, रिक्शा वाले कैसे वार्तालाप करते हैं, कालेज जाते लड़के-लड़कियाँ किस तरह बात करते हैं  तो हम पाएँगे कि हिन्दी का दायरा बढ़ चुका है। हिन्दी की तमाम बोलियाँ और शैलियाँ शाँतिपूर्ण सह अस्तित्व बनाए हैं। समय सी चल रही है हिन्दी, पानी सी बह रही है हिन्दी।

भारत एक बहुभाषी देश है। यहाँ हिन्दी बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक है। भारत दुनिया के सर्वाधिक जनसंख्या वाले देशों में दूसरे स्थान पर हे। पहले स्थान पर चीन है जहाँ अधिकतर लोग चीनी भाषा बोलते हैं। इस तरह विश्व की अधिकतर बोली जाने वाली भाषाओं में हिन्दी है। हिन्दी की ताकत उसकी रचनात्मकता में है। यह युग वैश्वीकरण और पारस्परिक स्पर्धा का है। ऐसे में हिन्दी सहज रूप से लचीली होकर आगे बढ़ रही है। आप ‘विश्वविद्यालय’ शब्द का इस्तेमाल करें तो बहुत अच्छा, अन्यथा ‘यूनिवर्सिटी’ शब्द से भी अब हिन्दी को परहेज नहीं रहा। वैसे, जब से दिल्ली में मैट्रो स्टेशन का नाम ‘विश्वविद्यालय’ रखा गया है तब से लोगों की जुबान पर ‘विश्वविद्यालय’ शब्द आसानी से आने लगा है। इस तरह शब्द रस भी जाते हैं और बस भी जाते हैं। हिन्दी के पास विशाल शब्द संपदा है और इस संपदा को बढ़ाने के लिए इसकी बाँहें व दिल सदा खुला है। क्या अब भी आप हिन्दी पर क्लिष्टता का आरोप लगाएंगे जबकी सरलता से प्रयुक्त होने वाले अनेक शब्द इसके कोष में भरे पड़े हैं।

कम्प्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट, ब्लाग्स, ई-पेपर, सोशल मीडिया में हिन्दी का प्रयोग आश्चर्यजनक बड़ा है। ‘एस. एम. एस.’, ‘स्टेटस’ और ट्वीट करने के लिए जनसाधारण हिन्दी का प्रयोग कर कहा है। हमारे लिए प्रोत्साहन यह है कि जहां इन उपकरणों के हाथ में आते ही सोच अंग्रेजी में चली जाती थी वहां अब हिन्दी की भी पैठ बनी है। ताजा सर्वेक्षण के अनुसार स्मार्ट फोन के वैश्विक इस्तेमाल में बढोतरी के साथ हिन्दी विकिपिडिया देखने वालों की संख्या में 115% की बढोतरी हुई है। इंटरनेट पर कई हिन्दी की साइटें हैं और तत्काल हिन्दी में अनुवाद की सुविधा भी है।

आज प्रवाह प्रबल है। हर क्षेत्र में तीव्र गति है। जितनी सूचना आज हम तक पहुँचती है उसकी 95% जानकारी इंटरनेट के आने से पहले होती ही नही थी। समाज अभूतपूर्व परिवर्तन का साक्षी बन रहा है। भाषा समाज का दर्पण होती है। समाज में होने वाली प्रत्येक गतिविधि का प्रतिबिम्ब भाषा में दिखना चाहिए। अतः इस युग में न केवल अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बल्कि फलने फूलने के लिए भी भाषा को प्रवाहमय होना चाहिए। हमारे लिए गर्व की बात यह है कि हिन्दी में एक गतिशीलता रहती है जिससे यह हर युग में स्वयं को अनुकूल कर लेती है।