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कृतज्ञता

http://hindi.webdunia.com/hindi-poems/hindi-poem-on-gratitude-118042700053_1.htm

मेरे प्रभु

रहा संग तू

न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु

 

असमर्थता की निर्जीवता में

तू विश्वास के प्राण भरता रहा

निराशा के अंधेरों में अक्सर

टिमटिमाता, उजाला करता रहा

मगर जब रुक ही गए कदम

ली तलवार तूने लड़ा जंग तू

न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु

 

उतारा जिस भी समंदर में तूने

तैराकी के अंदाज़ सिखाता रहा

अड़चनों से लड़ना, बच कर निकलना

तू राहें नईं दिखाता रहा

उस समय जब डूब ही जाती देह

अचंभा, कि आया, तिनका बन तू

न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु

 

खेल खिलाए अनोखे अनोखे

हराता, सिखाता, जिताता रहा

परिश्रम तेरा और मेरा पताका

करे कभी भी न मोह भंग तू

न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु

 

मेरे प्रभु

रहा संग तू

न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु

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हमसे हो न पाया

आरजू अपनी थी बहार-ए-महफिल बनने की

चिरागों को सूरज बताना, हमसे हो न पाया

 

मेरे घर से निकल जाते हैं रस्ते सभी आगे

किसी की राह में रोड़ा अड़ाना, हमसे हो न पाया

 

सच्चे भी छिपा लेते हैं बारिश में भीग कर

मगरमच्छ के आंसू बहाना, हमसे हो न पाया

 

मेरे आंगन में खिलते हैं सभी, बेला, गुलाब, जूही

बरगद बन के सबको दबाना,हमसे हो न पाया

 

सुन लेते हैं अपनी सभी नाकामियां, कमजोरियां

अपनों से आंखे चुराना,हमसे हो न पाया

 

सुना है बोल उठती हैं बातें अनुकूल

हवाओं को दर्पण दिखाना,हमसे हो न पाया

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हमदर्दी का कम्बल (Published in Rupayan 13-12-19)

ओढ़ाया तुमने हमदर्दी का कम्बल

सौहार्दपूर्ण गर्माहट के संग

बाहर हो तो हो

दिसम्बर की ठंड़

 

मूंगफली सी चटकती बातों ने

तिल तिल ख्वाहिशें उघाड़ी

जिसमें घोल दिए फिर

गुड़ जैसे संबंध

बाहर हो तो हो

दिसम्बर की ठंड़

 

कुहराते ख्यालों को

आशाओं ने भेदा

लगाव के अलाव ने दिखाए

आत्मीयता के ढंग

बाहर हो तो हो

दिसम्बर की ठंड़

 

बर्फ सी पड़ती शंकाओं पर

चमकी आश्वासनों की धूप

खिलते बागों में ले आए

दुनियादारी के रंग

बाहर हो तो हो

दिसम्बर की ठंड़

 

तितलियों सी बेपरवाह ज़िदगी

उड़ती गई फूल फूल

ठौर वहाँ जहाँ थकते पंख

या ठहराता मकरंद

बाहर हो तो हो

दिसम्बर की ठंड़

 

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जैसे दिसम्बर की धूप

Lehrein_Girija

साथ तुम्हारा लगता अच्छा

बातें लगती खूब

जैसे दिसम्बर की धूप

फुर्सत के क्षण लाना

अपने साथ बैठाना

अनुभव को छूते छूते

मनोरथ की रूह सहलाना

सहनशीलता के अनुरूप

जैसे दिसम्बर की धूप

भ्रम के कोहरे को काटकर

संशय के बादल छांटकर

जगाना संकल्पों की भूख

जैसे दिसम्बर की धूप

अतीत के काफिले को थाम

दिखाना उगता हुआ धाम

पास प्यासे के ले आना

संभावनओं का कूप

जैसे दिसम्बर की धूप

राहत की ठंड़क मिली

जो थे जलते हुए ख्वाब

सर्द सोते स्वप्न को मिला

अरमानों का अलाव

हर दिशा लाई हवा

जीवन से भरपूर

जैसे दिसम्बर की धूप

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स्वागत! शीत!

स्वागत! शीत! आओ

बन के मीत भाओ!

स्वागत! शीत! आओ

क्रोध ग्रीष्म का हो क्षीण
नभ अश्रु से हो हीन
राहत! गीत! गाओ
स्वागत! शीत! आओ

वामन स्वरूप आए दिन
कोहरे से रात जाए छिन
आलस! प्रीत! छाओ
स्वागत! शीत! आओ

भीतर तक ठंडक समाए
गर्माहट समीप बुलाए
अलाव! संगीत! सुनाओ
स्वागत! शीत! आओ

गुड़ की फैले मिठास
मूंगफली मेवों के साथ
आनंद! स्वादिष्ट! पकाओ
स्वागत! शीत! आओ

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पतझड़

मन की शाखाओं पर पड़े

अवसाद के पीले पत्ते

व्यंग बाणों से घायल

जड़ से हुए ढीले पत्ते

संताप के भावों से

जीर्ण हुए गीले पत्ते

गरल जगत का पीते पीते

हुए जो जहरीले पत्ते

समय रेत में ढलते ढलते

जमे हुए हठीले पत्ते

उड़ जाने दो इस बार उन्हें

हवाओं संग पतझड़ की

धरातल पर मन के बनने दो

उनको मिट्टी उर्वर की

मन का ठूंठ हो तैयार

उगे फिर नए लचीले पत्ते

जीवन के चमकीले पत्ते