प्राण तत्व

……..अरे ऐसा कैसे हो सकता है……

……..अब उस बच्चे का क्या होगा…..

……..मानवता की पराकाष्ठा क्या है…..

…….कहाँ जा रही है हमारी सभ्यता और क्या होगी इसकी परिणति…….

 

रोज़ ऐसा ही होता है। सुबह की पहली किरण के साथ मीता का दिन शुरू होता है। पूरे दिन की व्यस्तता के बाद जब वह रात का भोजन बनाने के लिए रसोई में जाती है तो पाक-क्रिया के साथ वह दिन भर की घटनाओं से भी घिर जाती है। उसका अचेतन मन सक्रिय हो जाता है और एक एक कर के अलग अलग तरह के विचार उसके मस्तिष्क में तैरते रहते हैं।

 

आज का दिन एक मिश्रित दिन था। बच्चों को स्कूल और पति को दफ्तर भेज कर वह खुद भी कार्यालय चली गई थी। आज दफ्तर में एक अस्पताल ने कैम्प लगाया था और प्राथमिक चिकित्सा के विषय में जानकारी दी थी।

……प्राथमिक चिकित्सा किसी का जीवन बचा सकती है……….

…………प्राथमिक चिकित्सा के लिए किट से अधिक आवश्यक है उसकी जानकारी होना……….

……….. मनुष्य की सहज प्रवृत्ति बचाना है………

………..बचाना मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है तो अखबार ? अखबार जिसमें कुछ दिन पहले एक बच्चे पर स्कूल टॉयलेट में हुए हमले की खबर छपती है। …….अखबार जो खबर देता है कि पुल पर एक व्यक्ति घायल कराहते हुए मौत के मुँह में चला गये  रहा और लोग आते जाते रहे….और आज की खबर…..दोस्त के साथ घूमने गया एक छात्र नहर में डूब गया।………….सहमे दोस्त ने पूरे दिन घटना को छिपाए रखा।…….डूबने वाले छात्र के परिजनों ने दोस्त पर लगाया अपहरण का आरोप………..

……पर ऐसा तो नहीं की अखबार में सिर्फ बुरी खबरें ही छपती हैं। आखिर इसी समाज में ही ऐसी अध्यापिकाएं भी हैं जिन्हें नवीन पद्वति के प्रयोग के लिए पुरस्कृत किया जाता है। ………..इसी समाज मे वे डाक्टर भी आते हैं जो जगह जगह कैम्प लगा कर यथा सम्भव मानव जीवन बचाने की चेष्टा करते हैं। आज कैम्प में कार्डियो पुलमोनेरी रिससिटेशन (CPR) जिसे संजीवन क्रिया  मुँह-से-मुँह पुनर्जीवन या चलती भाषा में जीवन चुम्बन  भी कहते हैं बताया गया था। यह एक ऐसी क्रिया है जो डॉक्टरी परामर्श से पहले उस समय भी किसी की जान बचा सकती है जब कोई दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति बेहोश होता है, सांस भी नहीं ले पा रहा होता है। इस क्रिया का उद्देश्य शरीर में श्वसन क्रिया और रक्ताभिसरण क्रिया को जारी रखना और डाक्टरी जाँच तक मरीज को जिंदा रखना है।

……..CPR में दो कार्य किए जाते हैं :-

  1. मुँह द्वारा सांस भरना
  2. छाती को दबाना

………….और कई लोग ठगी द्वारा मानवता की ही गला दबा देते हैं। ….आज नेहा बता रही थी कि उनके मुहल्ले में कोई इबाबत के चोले में लोग आए थे जो पहले लोगों को रूपये दोगुने करके दिखा रहे थे और जब लोग बड़े नोट ले कर आए तो वो ले कर चले गए। …….आंटी बता रहीं थी कि उनके घर कोई सोने के गहने साफ करने वाला आया था और सफाई के नाम पर उनके गहनों से सोना उतार कर ले गया…….गहनों का भार अब पहले से बहुत कम हो गया है। सीमा ने बताया था कि कैसे उसके मुहल्ले का एक व्यक्ति उससे बच्चे की बीमारी का बहाना बना कर उससे पैसे ले गया था और बाद में पता चला कि वो झूठ बोल रहा था……. पैसे भी लौटाने का नाम नहीं……..

खैर!  मीता यथार्थ में आई। उसके रसोई का काम लगभग निपट चुका था। मीता परिजनों के लिए बड़े चाव से बनाती थी लेकिन उससे भी ज्यादा उत्साहित रहती थी खाने के पश्चात् उपने पति मोहन जी के साथ वॉक पर जाने के लिए। रसोई समेटने के बाद बच्चे तो थोड़ी देर टी.वी. देखते थे और वो दोनों कुछ दूर सैर के लिए जाते थे। इस 5-10 मिनट की सैर मे उनकी बातचीत तो अधिक नहीं होती थी पर एक पूर्णता का अहसास अवश्य उनके साथ चलता था।

“चलें?” मीता ने तैयार हो कर मोहन जी से कहा।

“हाँ!  हाँ!” मोहन जी पहले से ही तैयार थे।

मीता मोहन जी के साथ चल रही थी। हाँ दिखता ऐसे ही था पर दरअसल वह उड़ रही थी……

…..चलो सजना जहाँ तक घटा चले…….

सड़क पर रोज़ जैसे अच्छा खासा ट्रैफिक था। रात की सैर उन्हें सड़क पर ही करनी पड़ती थी। फुटपाथ पर भी कई विक्रेता अपना सामान दिन भर बेचते थे अब जाने की तैयारी में थे। वही जगह जगह कूड़े के ढेर लगे थे। आज तो एक स्थान पर कई मजदूर से दिखने वाले लोग, जिनमें महिलाएं भी थी, जोर जोर से बहस कर रहे थे। मीता और मोहन जी रोज़ की ही भांति सबको देखते हुए और सबको अनदेखा करते हुए चलते रहे। अपने रोज़ के गंतव्य पर पहुँच कर वो लौट चले।

रौनक पहले से कम हो चुकी थी। फुटपाथ के विक्रेता भी जा चुके थे। कूड़े के ढेर पर कुत्ते टूट चुके थे। मजदूर से दिखने वाले अभी भी बहस में मशगूल थे।

अरे! ये क्या? उनके पास पहुँचते ही एक मजदूर उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। “बाबूजी! हमारी मदद कीजिए! हम बड़ी मुसीबत में हैं!”

“क्या हुआ?” मोहन जी उसकी करूण याचना को अनदेखा न कर सके।

“हमें ठेकेदार ने धोखा दिया है। वह हमें काम देने का झांसा देकर लाया था। अब कहता है काम नहीं है। मेरे साथ पूरा परिवार है। हम कहाँ जाए?”

“मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ?”

“कुछ पैसे दे दें तो हम टिकट खरीद कर घर वापस जा सकेंगे।”

“कितने पैसों से तुम्हारा काम चल जाएगा?”

“बारह सौ रूपया।”

“ठीक है। अभी तो मैं घूमने निकला था तो मेरे पास इतने पैसे नहीं है लेकिन मैं घर से लाकर देता हूँ।” मोहन जी ने आश्वासन दिया।

“आपकी बड़ी मेहरबानी होगी।”

मीता और मोहन जी आगे चले। मीता को याद आए वो दोगुना पैसा करने का लालच देकर लूटने वाले, वो सफाई के नाम पर गहनों से सोना उतार कर ले जाने वाले, वो बच्चे की बीमारी का बहाना बना कर पैसे ले जाने वाले। मीता को लगा वह मोहन जी को बता दे और उन्हें पैसे देने से रोक ले। आखिर इतनी मेहनत से कमाई रकम क्यों ऐसे लुट जाने दे। वो घर पहुँच चुके थे और मोहन जी अलमारी से पैसे निकाल रहे थे।

पर ऐसा भी तो हो सकता है कि वो सच ही बोल रहे हों। मीता को लगा कि दम तोड़ती हुई मानवता आज उसके रास्ते में घायल पड़ी है। उसकी एक चुप्पी आज जीवन चुम्बन का कार्य कर सकती है। उसने मोहन जी को पैसे ले कर जाने दिया और मानवता में प्राण तत्व भरने का अपने योगदान की ओर कदम बड़ा दिया।

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बूंद

हिम शिखर के ताज की एक बूंद

छिटका देती सूर्य का सिंदूर

हर लेती चाँद का नूर

चली एक दिन, सागर को ले ढूँढ

हिम शिखर के ताज की एक बूंद

 

रश्मि किरणों से चमकती, संवरती

उछलती, मचलती, फुदकती, संभलती

मन उमंग, तन तरंग

चाँद सी निर्मल, न कहीं कोई धूल

हिम शिखर के ताज की एक बूंद

 

वो शांति प्रदेश की कोहिनूर

मगन देखती तितली, फूल के रंग

पवन संग, मचलती वो बन के हिरन

वो तो चली थी बहुत दूर

हिम शिखर के ताज की एक बूंद

 

वो प्रतिमा सी, ईश मिलन को चली थी

वो पुजारिन वंदन को चली थी

हृदय, मस्तिष्क में सागर उसके

स्वागत को था आतुर

हिम शिखर के ताज की एक बूंद

 

सागर कितना अंजान मिला

लहरों से क्या आघात मिला

फेन बनी ता-थैया करती

थी गहराई से कितनी दूर

हिम शिखर के ताज की एक बूंद

सांप

सांप

मैं डरती हूँ तुमसे

तुम्हारे फुँफकारने से

तुम्हारे डँसने से

मैंने सुना है

तुम्हारी फुँफकार के बारे में

डँकके बारे में

देखा नहीं है

फिर भी बचती हूँ

तुमसे

या बचा लेती हूं

तुम्हें

खुद से

सांप

मैं भी सीखना चाहती हूँ ये फन

ताकि लोग डरे

मेरी भी फुँफकार से

डँक से

 

एक डर का अहसास

आसान कर देता है

कितने काम

सामंजस्य

Lehrein_Girija

सभी ग्रहों में, हमारा ग्रह पृथ्वी ही जीवन समर्थक है, क्योंकि यहां की प्रकृति जीवन के अनुकूल है। हमें सदा ही प्रकृति, पर्यावरण और जलवायु के ऋणी रहना चाहिए क्योंकि हमारा अस्तित्व इसी पर अवलम्बित है। उगता हुआ सूर्य, बहती हुई पवन, चहचहाती हुई चिड़िया, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, सुन्दर-सुन्दर फूल, जीव जगत आदि सभी, हमारी अनभिज्ञता के बावजूद, न केवल हमारे साथ रहते हैं बल्कि, इनका होना हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भी है।

रोजमर्रा के व्यस्त जीवन में यद्यपि हम प्रकृति से निरपेक्ष रहते हैं तथापि, ऐसा शायद ही कोई हो, जिसे प्रकृति ने आमंत्रण देते हुए अपनी ओर आकर्षित न किया हो। यह वही आकर्षण है जिससे खींचे हुए हम कभी पहाड़ों में, कभी मैदानों में, कभी सागर तट पर या कभी विदेश में सैर-सपाटे के लिए जाते हैं और तरो ताजा होकर लौटते हैं। इस समय हम प्रकृति के अत्याधिक निकट रहते हैं और पूरा पूरा आनंद उठाते हैं।…

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जीवन कटना था कट गया / गोपालदास “नीरज”

जीवन कटना था, कट गया
अच्छा कटा, बुरा कटा
यह तुम जानो
मैं तो यह समझता हूँ
कपड़ा पुराना एक फटना था, फट गया
जीवन कटना था कट गया।

रीता है क्या कुछ
बीता है क्या कुछ
यह हिसाब तुम करो
मैं तो यह कहता हूँ
परदा भरम का जो हटना था, हट गया
जीवन कटना था कट गया।

क्या होगा चुकने के बाद
बूँद-बूँद रिसने के बाद
यह चिंता तुम करो
मैं तो यह कहता हूँ
करजा जो मिटटी का पटना था, पट गया
जीवन कटना था कट गया।

बँधा हूँ कि खुला हूँ
मैला हूँ कि धुला हूँ
यह विचार तुम करो
मैं तो यह सुनता हूँ
घट-घट का अंतर जो घटना था, घट गया
जीवन कटना था कट गया।

तुमने कहा था

तुमने कहा था [कविता] – गिरिजा अरोड़ा

https://www.sahityashilpi.com/2018/07/blog-post_17.html

तुमने कहा था साथ रखना
सब होगा अच्छा विश्वास रखना

कोई बैरी नहीं सपनों का
स्वप्न मगर कुछ खास रखना

जिससे हिल जाए घर की दिवारें
नहीं कोई ऐसी बात रखना

कांटों से चुभते जीवन में
हँसने का उल्लास रखना

अंधेरी रातों का डर नहीं
अंतर केवल प्रकाश रखना

तुमने कहा था कि पतझड़ में
बसंत आने की आस रखना

प्रभुजी

Lehrein_Girija

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

हम तुम्हारी कृपा के उबारे है।

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

 

भूलभुलईया दुनिया सारी, राह न सूझे कोई

कहीं पे कुआँ गहरा दिखता कहीं पे दिखती खाई

सुझा दो जो रस्ते हमारे हैं।

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

 

किसी को सोना किसी को चाँदी सुन लो चाहहमारी

आशीषों से अपने भर दो, मूल्यवान तिजोरी

हम तुम्हारी ही पूँजी संभाले हैं

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

 

सब के कर्ता सब के धर्ता हम कोआस तुम्हारी

अपने रूपों से सजा दो, अपनी प्रेम क्यारी

तुम हो तो सुन्दर नजारे हैं

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

 

तुमने गले लगाया उसे जिसको सबने ठुकराया

अनहोने न्यायों से तुमने अपना नाम जताया

मिटा दो जो संकट हमारे हैं

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

 

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

बिन तुम्हारे तो हम बेचारे हैं

प्रभुजी हम तुम्हारे सहारे हैं।

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