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इन दिनों

व्यर्थ बढ़ गई है कांव कांव

कौए मगर दिखते नहीं

दोस्त बेहिसाब बनते हैं

दिल में मगर बसते नहीं

 

आंखों को सुंदर लगते

मन को भी भाते हैं

खुशबू की खातिर

लोग इत्र लगाते हैं

पेड़ पौधे फ्रेमों में रखते

पत्ते जहाँ गिरते नहीं

 

नन्ही सी गोरैया प्यारी

प्लास्टिक की बनाते हैं

कृत्रिम घोंसले में रख

घर को सजाते हैं

चूँ चूँ चिड़िया की मीठी

घंटी भी वही लगाते हैं

चुग कर गा पाए चिड़िया

दाना वो रखते नहीं

 

बातें बहुत सुंदर सुंदर

सुनने को मिलती हैं रोज

तन सुंदर, घर सुंदर

जहां पड़े परछाई अपनी

सारा वातावरण सुंदर

कितनी तहें खोजूँ पर

मन अपने सजते नहीं

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हमसे हो न पाया

आरजू अपनी थी बहार-ए-महफिल बनने की

चिरागों को सूरज बताना, हमसे हो न पाया

 

मेरे घर से निकल जाते हैं रस्ते सभी आगे

किसी की राह में रोड़ा अड़ाना, हमसे हो न पाया

 

सच्चे भी छिपा लेते हैं बारिश में भीग कर

मगरमच्छ के आंसू बहाना, हमसे हो न पाया

 

मेरे आंगन में खिलते हैं सभी, बेला, गुलाब, जूही

बरगद बन के सबको दबाना,हमसे हो न पाया

 

सुन लेते हैं अपनी सभी नाकामियां, कमजोरियां

अपनों से आंखे चुराना,हमसे हो न पाया

 

सुना है बोल उठती हैं बातें अनुकूल

हवाओं को दर्पण दिखाना,हमसे हो न पाया

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चली हवा अलबेली

चली हवा अलबेली

बरसात की सहेली

चली हवा अलबेली

 

सूरज, बादलों ने

खेली आंख मिचौनी

किसका पैगाम लाए

बन गई है पहेली

चली हवा अलबेली

 

मेघों को आज मिला क्या

जो उनका वक्ष फूला

उमड़ती उस खुशी को

छेड़ कर हठिली

चली हवा अलबेली

 

ले कर बूंदे साथ

नन्हें नन्हें जैसे ताज़

फूलों घाटियों को

सजाती अकेली

चली हवा अलबेली

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सूरज

सूरज

तुम्हारी किरणों की

हुई है टेढ़ी चाल

नींद भी बिगड़ी है इनकी

और बिगड़े हैं हाल

सीतनिद्रा में जगते हो

गरमी में सो जाते

कंपकपी क्यों है पैरों में

कदम क्यों लडखड़ाते

अपना हाथ दिखाओ

बी पी चैक करवाओ

ब्लड सैम्पल दो

विटामिन डी बिगड़ा दिखता है

उसकी जाँच कराओ

अपनी रिपोर्टों के अनुरूप

सप्लीमेंटस् खाओ,  योगा-ध्यान लगाओ

देखो सेहत है सबसे पहले

लापरवाही मत दिखलाओ

तुम पर आश्रित हैं हम सब

इस हेतु स्वास्थ अपनाओ

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मैंने लगाई थी एक अर्जी

http://hindi.webdunia.com/hindi-poems/best-sun-poem-118060800042_1.html

sun_summer630

मैंने लगाई थी एक अर्जी,
धूप के दरबार में,
मान ली सूर्य ने,
जो भी थी वे।
कहा मैंने था कि कम है,
तेज थोड़ा किरणों में,
उर्जा रहित होती देह,
आ न जाए जीर्णों में।
तीव्र मिल गईं किरणें अपार हमें,
मैंने लगाई थी एक अर्जी,
धूप के दरबार में।
शुष्कता हवा की बताया,
काट देती है त्वचा,
बर्फ कर देते हो जिसको,
पानी प्रकृति ने था रचा।
ऊष्णता बढ़ाई भानु ने व्यवहार में,
मैंने लगाई थी एक अर्जी,
धूप के दरबार में।
हो गई मंजूर अर्जी,
सूर्य रहा न्यायधर्मी,
सर्दी की थी अर्जी मगर,
हुई मंजूर जब आई गर्मी।
मैंने लगाई थी एक अर्जी,
धूप के दरबार में,
मान ली सूर्य ने,
जो भी थी फरियाद वे।
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दावानल

यूँ ही नहीं जलता वन

यूँ ही नहीं दहकता जंगल

 

सूखती जाती हैं

कुछ अपनी ही डालियां

रूखी हो जाती है

बहती हुई हवा

कलहकारी बन जाती हैं

धरातल की पत्तियां

 

रूक नहीं पाती चिंगारी

सह कर टकराहट

आते नहीं बादल

लिए, बारिश की तरावट

 

तब धूं धूं कर उठता वन

और दूर दूर तक जाती

इस आग की तपन

 

क्या बच पाता है

जब लगता है दावानल